अयोध्याकाण्ड - Ayodhaya Kand

अयोध्याकाण्ड मंगलाचरण

द्वितीय सोपान-मंगलाचरण

श्लोक :
यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके
भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्री शंकरः पातु माम्॥1॥

भावार्थ:- जिनकी गोद में हिमाचलसुता पार्वतीजी, मस्तक पर गंगाजी, ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा, कंठ में हलाहल विष और वक्षःस्थल पर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं, वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, संहारकर्ता (या भक्तों के पापनाशक), सर्वव्यापक, कल्याण रूप, चन्द्रमा के समान शुभ्रवर्ण श्री शंकरजी सदा मेरी रक्षा करें॥1॥ Read more about अयोध्याकाण्ड मंगलाचरण

बालकाण्ड - Bal Kand

श्री रामचरित्‌ सुनने-गाने की महिमा

दोहा :
राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु।
जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु॥360॥

भावार्थ:- गाधिकुल के चन्द्रमा विश्वामित्रजी बड़े हर्ष के साथ श्री रामचन्द्रजी के रूप, राजा दशरथजी की भक्ति, (चारों भाइयों के) विवाह और (सबके) उत्साह और आनंद को मन ही मन सराहते जाते हैं॥360॥ Read more about श्री रामचरित्‌ सुनने-गाने की महिमा

बालकाण्ड - Bal Kand

बारात का अयोध्या लौटना

चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई॥
रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी॥4॥

भावार्थ:- डंका बजाकर बारात चली। छोटे-बड़े सभी समुदाय प्रसन्न हैं। (रास्ते के) गाँव के स्त्री-पुरुष श्री रामचन्द्रजी को देखकर नेत्रों का फल पाकर सुखी होते हैं॥4॥ Read more about बारात का अयोध्या लौटना

बालकाण्ड - Bal Kand

श्री सीता-राम विवाह और विदाई

छन्द :
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं।
नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं॥
कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं।
मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥

भावार्थ:- सुंदर मंगल का साज सजकर (रनिवास की) स्त्रियाँ और सखियाँ आदर सहित सीताजी को लिवा चलीं। सभी सुंदरियाँ सोलहों श्रृंगार किए हुए मतवाले हाथियों की चाल से चलने वाली हैं। उनके मनोहर गान को सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेव की कोयलें भी लजा जाती हैं। पायजेब, पैंजनी और सुंदर कंकण ताल की गति पर बड़े सुंदर बज रहे हैं। Read more about श्री सीता-राम विवाह और विदाई

बालकाण्ड - Bal Kand

बारात का जनकपुर में स्वागत

चौपाई :
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥
भरे सुधा सम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने॥1॥

भावार्थ:- (दूध, शर्बत, ठंडाई, जल आदि से) भरकर सोने के कलश तथा जिनका वर्णन नहीं हो सकता ऐसे अमृत के समान भाँति-भाँति के सब पकवानों से भरे हुए परात, थाल आदि अनेक प्रकार के सुंदर बर्तन,॥1॥ Read more about बारात का जनकपुर में स्वागत

बालकाण्ड - Bal Kand

दशरथजी के पास जनकजी का दूत भेजना, अयोध्या से बारात का प्रस्थान

दोहा :
तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु।
बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु॥286॥

भावार्थ:- तथापि तुम जाकर अपने कुल का जैसा व्यवहार हो, ब्राह्मणों, कुल के बूढ़ों और गुरुओं से पूछकर और वेदों में वर्णित जैसा आचार हो वैसा करो॥286॥ Read more about दशरथजी के पास जनकजी का दूत भेजना, अयोध्या से बारात का प्रस्थान

बालकाण्ड - Bal Kand

श्री राम-लक्ष्मण का परशुराम जी से संवाद

चौपाई :
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥1॥

भावार्थ:- हे नाथ! शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई एक दास ही होगा। क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? यह सुनकर क्रोधी मुनि रिसाकर बोले-॥1॥ Read more about श्री राम-लक्ष्मण का परशुराम जी से संवाद

आदर्श मित्र - Good Friend

आदर्श मित्र

‘एकाकी बादल रो देते, एकाकी रवि जलते रहते।” वास्तव में जीवन में अकेलापन विधाता का एक अभिशाप है। इस अभिशाप से विवश होकर मनुष्य कभी-कभी आत्महत्या करने को भी उतारू हो जाता है। Read more about आदर्श मित्र

धन का सदुपयोग - Good Utilisation of Money

धन का सदुपयोग

धन के सदुपयोग का अर्थ है-धन को अनावश्यक व्यय न करना वरन् सत्कार्यों में लगाना। किसी मनुष्य के पास यदि अधिक धन है तो उसे चाहिए कि वह उस धन को अपने ऐशो-आराम पर व्यय न करे। इसी को ‘धन का सदुपयोग’ कहते हैं। Read more about धन का सदुपयोग

समय का सदुपयोग - Good Utilisation of Time

समय का सदुपयोग

संसार में समय को सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण एवं मूल्यवान धन माना गया है। अतः हमें इस मूल्यवान धन अर्थात् समय को व्यर्थ ही नष्ट नहीं करना चाहिए क्योंकि बीता हुआ समय वापस नहीं लौट पाता। Read more about समय का सदुपयोग