अरण्यकाण्ड - Araṇya Kanḍa

अत्रि मिलन एवं स्तुति

सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई॥
अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ॥2॥

भावार्थ:- (इसलिए) सब मुनियों से विदा लेकर सीताजी सहित दोनों भाई चले! जब प्रभु अत्रिजी के आश्रम में गए, तो उनका आगमन सुनते ही महामुनि हर्षित हो गए॥2॥ Read more about अत्रि मिलन एवं स्तुति

अरण्यकाण्ड - Araṇya Kanḍa

जयंत की कुटिलता और फल प्राप्ति

एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥
सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥2॥

भावार्थ : एक बार सुंदर फूल चुनकर श्री रामजी ने अपने हाथों से भाँति-भाँति के गहने बनाए और सुंदर स्फटिक शिला पर बैठे हुए प्रभु ने आदर के साथ वे गहने श्री सीताजी को पहनाए॥2॥ Read more about जयंत की कुटिलता और फल प्राप्ति

अयोध्याकाण्ड - Ayodhaya Kand

श्री भरत जी का अयोध्या लौटना

दोहा :
सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।
भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर॥321॥

भावार्थ:- छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी समेत प्रभु श्री रामचंद्रजी पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञान शरीर धारण कर के शोभित हो रहे हों॥321॥ Read more about श्री भरत जी का अयोध्या लौटना

अयोध्याकाण्ड - Ayodhaya Kand

श्री राम-भरत-संवाद, पादुका प्रदान, भरतजी की बिदाई

चौपाई :
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू॥
भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं॥1॥

भावार्थ:- (अगले छठे दिन) सबेरे स्नान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करने के लिए अच्छा दिन है, यह मन में जानकर भी कृपालु श्री रामजी कहने में सकुचा रहे हैं॥1॥ Read more about श्री राम-भरत-संवाद, पादुका प्रदान, भरतजी की बिदाई

अयोध्याकाण्ड - Ayodhaya Kand

भरत जी का तीर्थ जल स्थापन तथा चित्रकूट भ्रमण

दोहा :
अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।
राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप॥309॥

भावार्थ:- तब अत्रिजी ने भरतजी से कहा- इस पर्वत के समीप ही एक सुंदर कुआँ है। इस पवित्र, अनुपम और अमृत जैसे तीर्थजल को उसी में स्थापित कर दीजिए॥309॥ Read more about भरत जी का तीर्थ जल स्थापन तथा चित्रकूट भ्रमण

अयोध्याकाण्ड - Ayodhaya Kand

श्री राम-भरत संवाद

दोहा :
राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत॥296॥

भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी की शपथ सुनकर सभा समेत मुनि और जनकजी सकुचा गए (स्तम्भित रह गए)। किसी से उत्तर देते नहीं बनता, सब लोग भरतजी का मुँह ताक रहे हैं॥296॥ Read more about श्री राम-भरत संवाद

अयोध्याकाण्ड - Ayodhaya Kand

जनक-वशिष्ठादि संवाद, इंद्र की चिंता, सरस्वती का इंद्र को समझाना

आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥
करि प्रनामु तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए॥3॥

भावार्थ:- अतः आप आश्रम को पधारिए। इतना कह मुनिराज स्नेह से शिथिल हो गए। तब श्री रामजी प्रणाम करके चले गए और ऋषि वशिष्ठजी धीरज धरकर जनकजी के पास आए॥3॥ Read more about जनक-वशिष्ठादि संवाद, इंद्र की चिंता, सरस्वती का इंद्र को समझाना

अयोध्याकाण्ड - Ayodhaya Kand

जनक-सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा

दोहा :
बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि।
कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि॥287॥

भावार्थ:- राजा-रानी ने बार-बार मिलकर और हृदय से लगाकर तथा सम्मान करके सीताजी को विदा किया। चतुर रानी ने समय पाकर राजा से सुंदर वाणी में भरतजी की दशा का वर्णन किया॥287॥ Read more about जनक-सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा

अयोध्याकाण्ड - Ayodhaya Kand

श्री कौशल्या-सुनयना संवाद

दोहा :
एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।
सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु॥280॥

भावार्थ:- सब लोग कह रहे हैं कि हम इस सुख के योग्य नहीं हैं, हमारे ऐसे भाग्य कहाँ? दोनों समाजों का श्री रामचन्द्रजी के चरणों में सहज स्वभाव से ही प्रेम है॥280॥ Read more about श्री कौशल्या-सुनयना संवाद