परिचय से मिलता है साहस

लेशान के मैत्रेय बुद्ध

चीन का एक प्रांत सिचुआन| इसके दक्षिण में जो तीन नदियां बहती हैं उनके नाम हैं मिंजियांग, क्विंगी और दादूण्इन| तीनों नदियों का एक स्थान पर मिलन होता है जिसे लेशान के नाम से जानते हैं| लेशान शहर की मनोरम छटा देखते ही बनती है| नजर जिधर तक जाए उधर दूर-दूर तक प्रकृति की धरोहर ही दिखाई देती है| यहीं पर है मैत्रेय बुद्ध की विशाल मगर शांत प्रतिमा जिससे आपकी नजर हटने की नाम नहीं लेगी| विश्व की सांस्कृतिक धरोहरों में दुनिया इसे ‘लेशान जिआंट बुद्धा’ के नाम से जानती है| एक चट्टान को तराशकर इसे बनाया गया है| विश्व धरोहरों में शामिल इस विशाल बुद्ध की प्रतिमा का निर्माण 713 ईसवीं में टेंग वंश के शासनकाल में चीनी साधू ने शुरू किया था| इनका नाम था – हाइ तोंग| अब आप सोच रहे होंगे कि एक साधू इतनी बड़ी प्रतिमा को अकेले कैसे तराश सकता है| वह भी नदियों और विशालकाय पहाड़ों के चेहरे पर! हैरान होने वाली बात ही है क्योंकि 71 मीटर ऊंची तथा 28 मीटर चौड़ी यह दुनिया की सबसे ऊंची और विशाल बुद्ध की प्रतिमा है| अभी हम बात कर रहे थे कि क्या एक साधू इतनी बड़ी प्रतिमा को अकेले ही तराश सकता है| बिलकुल नहीं, हाइ तोंग, नाम के इस साधू के साथ और बाद में उनके बहुत से अनुयाइयों ने 90 वर्षों तक दिन-रात लगकर पहाड़ को तराशा, तब कहीं जाकर बुद्ध का यह शांत रूप निकलकर सामने आया| हाइ तोंग के जिंदा रहते इसका काम कभी नहीं रुका लेकिन उनकी मृत्यु के बाद धन की कमी होने लगी जिस कारण यहां काम रुक गया| क्षेत्र के लोगों को लगा कि अब हाइ तोंग का सपना कभी पूरा नहीं हो सकेगा| लगभग 70 वर्षों के बाद एक क्षेत्रीय सैनिक शासक ने इस काम के लिए धन की व्यवस्था की और इस प्रकार सैकड़ों अनुयाइयों के सहयोग से मैत्रेय बुद्ध का मनोहारी रूप पत्थर पर उकेरा जा सका| इस चीनी गुरु ने यहीं पर ही क्यों इस खूबसूरत बुद्ध की प्रतिमा को खड़ा करने का निर्णय लिया| इसके पीछे एक कहानी है| दरअसल, इस जगह पर तीनों नदियों का मिलन तो होता है, परंतु पानी का बहाव इतना तेज रहता था कि यहां से गुजरने वाले जहाज तेज धार में फंसकर डूब जाते थे| छोटे-मोटे जल वाहन तो यहां से गुजरते ही नहीं थे| यह जलमार्ग काफी महत्वपूर्ण था इसलिए यहां से जहाजों का गुजरना एकदम नहीं रोका सकता था| हाइ तोंग ने सोचा कि यदि यहां पर बुद्ध की एक शांत और स्थिर प्रतिमा खड़ी कर दी जाए तो बुद्ध इस अशांत और खतरनाक पानी को शांत कर देंगे जिससे यहां दुर्घटनाएं बंद हो जाएंगी| इसी को ध्यान में रखकर हाइ तोंग ने यह जगह देखकर यहां विशालकाय पहाड़ को काटना शुरू कर दिया| पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा काटते वक्त नदी में गिर गया| इस पहाड़ के नदी में गिरने से जो तेज बहाव था वह कम हो गया| अशांत पानी कुछ शांत हो गया| बहाव की ताकत कम हुई तो दुर्घटनाएं कम होती चली गईं| इसे लोगों ने एक चमत्कार माना, अब इस पहाड़ को साधू ने तराशना शुरू किया| सालों-साल की अथक मेहनत ने आकार लेना शुरू कर दिया| एक साधू की जी-तोड़ मेहनत और लगन को देखकर उनके अनुयाई तो साथ में लगे ही, आस-पास के निवासी भी अपना श्रमदान करने लगे और हाइ तोंग नाम के इस साधू की जय-जयकार होने लगी| प्राकृतिक संयोगवश विशाल पत्थर के पानी में गिरने से तेज धार कमजोर पड़ गई जिसके चलते बहाव कमजोर पड़ गया और दुर्घटनाएं भी नहीं हुईं ख़ैर, अब यह 1996 से विश्व धरोहर के रूप में हमारे सामने है| यहां दुनियाभर के पर्यटक आते हैं| बुद्ध के पैरों के नीचे नदी बहती है और चेहरे के ठीक सामने ऐमी पहाड़ दिखाई देता है| वर्षा और धूप से बचने के लिए इसके निर्माण के वक्त तेरह मंजिल की एक लकड़ी की छत्र छाया का निर्माण किया गया था| युआन वंश के अंतिम दौर में मंगोलों ने इस लकड़ी की छत्र छाया को नष्ट कर दिया, तब से आज तक यह खुले आसमान में है, ऐमी पहाड़ पर लगभग 30 मंदिर हैं लेकिन चीन की सांस्कृतिक धरोहरों में ‘लेशान जिआंट बुद्धा’ का स्थान महत्वपूर्ण है, इसे चार सबसे पवित्र चीनी बौद्ध धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है| वहीं, जैसे-विविधता का प्रचुर भंडार भी है| यहां लगभग 3200 प्लांट प्रजातियां तथा 2300 जंतु प्रजातियां यहां पर खोजी जा चुकी हैं| इसकी अपार सुंदरता को देखकर यहां बार-बार आने का मन करेगा लेकिन शांति के प्रतीक बुद्ध की इस प्रतिमा और यहां के वातावरण पर अब प्रदूषण का खतरा मंडराने लगा है| यहां आने वाले पर्यटक पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली बहुत सी वस्तुओं को यहीं छोड़ जाते हैं| मोनोरेल और केबल कार जैसे संपर्क साधनों के यहां पहुंचने से पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है| चीन की सरकार ने इसके आस-पास की फक्ट्रियों को बंद करा दिया है और हर आने-जाने वाले को यहां की सुंदरता को बनाए और बचाए रखने के बारे में बताया जाता है| प्रकृति और संस्कृति के मिल्न का अद्भुत यह उदाहरण तो है ही पर्यावरण की दृष्टि से भी यह वास्तव में एक विश्व धरोहर है|

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