मानव जीवन का मनोरथ - Desire of Human Life

मानव जीवन का मनोरथ

मानव जीवन का मनोरथ क्या है, इस बारे में गुरु अमरदास जी ने बड़े स्पष्ट विचार दिए हैं। उन्होंने कई तरीकों से यह दृढ़ करवाया है कि मानव जन्म, विषय विकारों में बर्बाद करने के लिए नहीं है, किसी ऊंचे प्रयोजन के लिए है।

गुरु जी ने मनुष्य को स्बोधित करते हुए बहुत बुलंद आवाज से कहा है कि हे इनसान! तू यह तो सोच कि संसार में जन्म ले कर तू ने आज तक कौन सा अच्छ कर्म किया है। जिस हरी ने तेरे शरीर की सृजना की है, उसको तूने अपने अंतर में नहीं बसाया है। परमेश्वर, गुरु की कृपा द्वारा ही मनुष्य के हृदय में बस सकता है। इसलिए सतगुरु की शिक्षाओं के संग मन जोड़ने से ही हमारा मानव जन्म सफल हो सकता है । जिन व्यक्तियों ने सतगुर के उपदेशों में मन लगा कर, परमेश्वर को अपने मन में नहीं बसाया है, उन के जीवन को सतगुरु जी धिक्कारते हैं। उनके खाने पीने, अच्छे वस्त्र पहनने, सोने और भाति-भांति के भोग विलास आदि पर धिक्कारते हैं क्योंकि इस प्रकार वह मानव जन्म को व्यर्थ ही गंवा रहे हैं ।

ए सरीरा मेरिआ इसु जग महि आइ कै किआ तुधु करम कमाइआ ॥ कि करम कमाइआ तुधु सरीरा जा तू जग महि आइआ ॥ जिनि हरि तेरा रचनु रचिआ सो हरि मनि न वसाइआ ॥ गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ ॥ कहै नानकु एहु सरीरु परवाणु होआ जिनि सतिगुर सिउ चितु लाइआ ॥

(रामकली महला 3, अनंद, पृ १21)

भाई रे भगतिहीणु काहे जगि आइआ ॥ पूरे गुर की सेव न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥ (पृ 64)
सतिगुरु जिना न सेविउ सबृदि ने लगो पिआरु ॥ सहजें नामु न धिआइआ किंतु आइआ संसारि ॥

(गूजरी की वार, महला ३, पृ 512)

सफलु जनमु जिन्ही गुरमुखि जाता हरि जीउ रिदै वसाए ॥ बाझु गुरू फिरै बिललादी दूजै भाइ खुआए ॥

(गूजरी की वार महला 3, पृ 513)

सतिगुर सिउ चितु न लाइओ नामु न वसिओ मनि आइ ॥ ध्रिगु इवेहा जीविआ किआ जुग महि पाइआ आइ ॥

(गूजरी की वार महला ३, पृ 510)

धिगु धिगु खाइआ, धिंग धिग सोइआ॥ धिगु धिग कापड़ अंगि चढाइआ॥ धिगु सरीर कुटंब सहित सिउ जितु हुणि वसमु न पाइआ॥ पउड़ी छुडकी फिरि हाथि न आवै, अहिला जनमु गवाइआ॥ .

(बिलावल, महला ३, पृ 196)

गुरमुखि हरि जीउ सदा धिआवहु जब लगु जीअ परान ॥ गुर सबदी मनु निरमलु होआ चूका मनि अभिमानु ॥ सफलु जनमु तिसु प्रानी केरा हरि कै नामि समान ॥

(प्रभाती महला ३, पृ 1334)

मानस जनमि सतगुरु न सेविंआ, बिरथा जनमु गवाइआ॥ नदर करे ता सतिगुरु मेले, सहजें सहजि समाइआ॥

(प्रभाती महली 3, 1334)

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