सांसारिक बड़प्पन का गर्न तथा चौधरी बख्तावर - Worldly nobility and Chaudhary Bakhtawar

सांसारिक बड़प्पन का गर्न तथा चौधरी बख्तावर

सन् 1547 के करीब गुरू अंगद देव जी ने मालवा का एक छोय सा प्रचारक दौरा किया। अपने पुराने इलाके, पत्ते दी सरां आदि से लेकर गांव हरीके आ पहुंचे। बहुत पहले हरीके में आपने कुछ समय तक दुकानदारी का काम किया था। यहां के लोग इस कारण वैसे भी आपको अच्छी तरह जानते थे।

यहां का मुखिया चौधरी बख्तावर था। यह एक मायावादी और अहंकारी आदमी था। 72 गांवों का लगान भरने के कारण इसको अपने आर्थिक स्तर पर बहुत गर्व था। वह माया के गर्व सेमदमस्त हुआ गुरू अंगद देव जी को मिलने आया । उसने गुरू अंगद देव जी की आत्मिक महिमा भी लोगों से बहुत सुन रखी थी। उसके अहंकार भरे आचरण को सिखों ने कतई पसंद नहीं किया। वह धनवान होने के कारण अपने आपको आत्मिक जगत में भी चौधरी समझे बैठा था। वह संगत में बैठे गरीब तथा नीच जाति के सिखों के बराबर बैठने को तैयार नूहीं था। वह केवल माया की बहुतायात के कारण अपने आपको बड़ा समझता रहा था।

गुरू जी ने उसको बड़े प्रेम से समझाया कि यह सांसरिक सम्मान झूठ हैं और यह सांसरिक सम्मान तो बल्कि भट्टी में डालने योग्य है, क्योंकि जब तक सांसरिक सम्मान हमारे मन में कायम हैं, उच्च आत्मिक अवस्था पैदा ही नहीं ले सकती और न ही हम परमेश्वर का नाम सिमरन करने की ओर ही लग सकते हैं। परमेश्वर के आगे तो न हमारा जाति अभिमान काम आ सकता है और न ही ज़ोर ज़बरदस्ती द्वारा उसके आगे हम अच्छे कहलवा सकते हैं। अच्छे तो हम तभी कहलवा सकते हैं यदि परमेश्वर हमारी अच्छाई को स्वीकार करे। परमेश्वर के सामने अच्छा बनने के लिए हमें दिल मन से अच्छा तथा नेक बनना होगा और सांसरिक प्राप्तियों का झूठा गर्व मन में से निकालना होगा। चौधरी बख्तावर गर्व छोड़ कर गुरू उपदेश का धारणकर्ता से गया और संगत की सेवा करने लगा।

मायाधारी लोगों से आजकल के तिजारती रुचियों वाले साधु तथा देहधारी गुरू बुरी तरह कतराते हैं। उनकी आर्थिक तथा अहंकारी वृत्ति को निरर्थक तथा हानिकारक बताना तो कहीं रहा, उनकी चाटुकारिता करते हुए नहीं थकते तथा उनके आगे यों यों करते फिरते हैं। दलेरीपूर्वक से सत्य को सत्य तथा कच्चे को कच्चा कहने को तैयार नहीं लेते। जैसे-जैसे उनको श्रद्धालु मिलते हैं, वैस-वैसे वे नियम तथा मर्यादा बनाते जाते हैं। ‘गंगा गऐ गंगा राम, जमना गऐ तो जमना दास’ नाम धरना उनका राम बाण है, जिससे वे अपना शिकार करते ही रहते हैं। सच्चाई पर दृढ़ता से पहरा देना और सच्चाई के लिए निर्भय सेकर विचरण करना मर्द पुरुष, गुरू अंगद पातशाह के ही हिस्से आता है।

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