श्री गुरु हरगोबिन्द जी - Shri Guru Hargobind Sahib Ji

गुरू सुपुत्रा श्री गुरूदिता जी का निधन (Shri Guru Hargobind Ji)

बाबा गुरूदिता जी ने पिता श्री गुरूहरिगोविन्द जी के आदेश अनुसार उनके बताये गये स्थल पर एक सुन्दर नगर का निर्माणप्रारम्भ कर दिया और इस नगर का नाम गुरूआज्ञा से कीरतपुर रखा। जल्दी ही यह नगर विकास की ओर बढ़ने लगा क्योंकि दूर दूर से यहाँ पर संगत का आवागमन | होने लगा। यहीं आपने एक सुन्दर भव्य गृह बनवाया, जिसका नाम शीश महल रखा। कुछ समय पश्चात् आप के यहाँ क्रमशः दो पुत्रों ने जन्म लिया। धीरमल व (गुरू) हरिराय जी, जब यह नगर विकास की चरम सीमा में पहुंचा तो श्री गुरू हरिगोवन्द साहब भी स्थानान्तरित होकर चिरस्थाई निवास यहीं रखने लगे।

एक दिन बाबा गुरूदिता जी अपने कुछ मित्रों के संग शिकार खेलने गये हुए थे कि जंगल में भूल से एक भूरी गाय को हिरन समझ उनके एक साथी ने तीर मार दिया, जिससे वह मर गई। उसी समय उस गाय का मालिक आ पहुँचा और वह गौ हत्या की दुहाई देने लगा। इस पर बाबा गुरूदिता जी ने उसे बहुत समझाया, भइया इस का मुँह माँगे दाम ले लो, किन्तु वह नहीं माना। उस समय बाबा गुरूदिता जी दुविधा में उलझ गये । स्थानीय लोगों ने गो हत्या का आरोप लगाया। इस पर बाबा गुरूदिता जी ने आत्म शक्ति का प्रयोग कर, गाय के ऊपर सत्य नाम वाहे गुरू कह कर जल के छीटें दे दिये। गाय जीवित हो गई और घास चरने लगी। यह घटना हँगल में आग की तरह लोगों की चर्चा का विषय बन गई।

जब यह चर्चा गुरूदेव के कानों में पहुँची तो वह बहुत नाराज हुए, उन्होंने तुरन्त गुरूदिता जी को बुलाकर कहा – तुम अब परम पिता परमेश्वर के प्रतिद्वन्द्वी बन गये हो। वह जिसको मृत्यु देता है, उसे तुमने जीवन देने का ठेका ले लिया है ? बस यह डांट सुनते ही गुरूदिता जी लौट आये और एक एकान्त स्थान पर चादर तानकर सो गये और आत्म बल से शरीर त्याग दिया।

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